सेंसर की कैंची चली, लेकिन नहीं टूटा हौसला: ‘बलि’ के चार-पांच सीन कटे, फिर भी दमदार है फिल्म
ओपन मीट में निर्देशक गंगा सागर पंडा बोले- मेकर्स को कई चुनौतियों से गुजरना पड़ता है, क्षेत्रीय फिल्मों को भी मिलना चाहिए समान सम्मान

सिनेमा 36. आगामी 19 जून को रिलीज होने जा रही छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘बलि’ के लेखक और निर्देशक गंगा सागर पंडा ने कहा है कि फिल्म निर्माण की प्रक्रिया केवल कहानी और अभिनय तक सीमित नहीं होती, बल्कि मेकर्स को कई तरह की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। सोमवार को पुरानी बस्ती स्थित अग्रवाल भवन में बलि के ओपन मीट के दौरान सेंसर बोर्ड से जुड़े सवाल के जवाब में उन्होंने अपने अनुभव साझा किए।
गंगा सागर पंडा ने कहा कि कई बार किसी फिल्म पर महीनों की मेहनत होती है, लेकिन सेंसर प्रक्रिया के दौरान कुछ दृश्यों या संवादों में बदलाव करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि फिल्म ‘बलि’ के भी चार से पांच सीन सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के कारण हटाने पड़े। उनके मुताबिक वे दृश्य काफी प्रभावशाली थे और यदि फिल्म में बने रहते तो दर्शकों को कहानी का एक अलग आयाम देखने को मिलता।
उन्होंने कहा कि फिल्मकारों को सेंसर बोर्ड के निर्देशों का सम्मान करना पड़ता है, लेकिन जब मेहनत से तैयार किए गए दृश्यों पर कैंची चलती है तो स्वाभाविक रूप से पीड़ा होती है। इसके बावजूद उन्होंने माना कि अच्छी फिल्मों का मूल्यांकन अंततः दर्शक ही करते हैं।
पंडा ने क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों की चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को राष्ट्रीय स्तर पर उतनी पहचान नहीं मिल पाती, जितनी मिलनी चाहिए। इसके बावजूद स्थानीय फिल्मकार लगातार बेहतर कंटेंट और तकनीकी गुणवत्ता के साथ काम कर रहे हैं।
उन्होंने दर्शकों से 19 जून को रिलीज होने वाली ‘बलि’ को सिनेमाघरों में जाकर देखने और छत्तीसगढ़ी सिनेमा का समर्थन करने की अपील की।




