Film GossipsReview & information

सादगी और भावनाओं से सराबोर एमए प्रीवियस

नई कहानी, नया फ्लेवर और एक अच्छी फिल्म

सिनेमा 36. बीए सीरीज की फिल्म एमए प्रीवियस एक लाइट फ्लेवर वाली फिल्म है जो आपको अपने रौ में बहा ली जाती है। प्रणव झा के निर्देशन और दीपक साहू, राज वर्मा, हिरणमयी दास और आराधना साहू आदि सितारों से सजी फिल्म एक खुशनुमा अहसास देती है।

कहानी

एमएम प्रीवियस दो ऐसे भाइयों की कहानी है जिनका जन्म एक ही तारीख को हुआ है हालांकि दोनों में 5 साल का गैप है। वे हर काम एक सेम डेट पर करते हैं। इसलिए फिल्म की टैग लाइन भी है एक्केच डेट म। राज को अरेंज मैरिज पसंद है जबकि दीपक को लव मैरिज। जिस कॉलेज में दीपक एमए प्रीवियस कर रहा होता है वहीं राज की नौकरी प्रोफ़ेसर के तौर पर लग जाती है। इस बीच दोनों की मुलाकात दो बहनों दिशा और मंजिल से होती है। बड़ी बहन दिशा की शादी राज से फिक्स हो जाती है जबकि छोटी यानी आराधना को दीपक चाहने लगता है। और दोनों एक- दूसरे को स्वीकार कर लेते हैं। शादी के कार्ड छपते हैं और बंट भी जाते हैं। तब पता चलता है कि मंजिल के दादा ने उसके रिश्ते की जबान कहीं और दे दी है। यहां से फिल्म का प्री क्लाइमेक्स शुरू होता है।

अभिनय

दीपक के अभिनय को हम सभी ने एमसीबी 3 और राजा रानी में देखा है। इस बार भी उनकी अदाकारी काबिले तारीफ है। राज वर्मा भी जमे हैं लेकिन कहीं-कहीं उनका इमोशन छूटता नजर आता है। हिरणमयी और आराधना खूब जंची हैं। छोटी बहन का किरदार आराधना ने बखूबी निभाया है। अन्य किरदारों ने भी खुद को साबित किया है।

निर्देशन/बीजीएम/ डीओपी

प्रणव झा की फिल्मों में बहुत से डायलॉग या सीन आंखों देखी होते हैं। यानी अपने जीवनकाल में उन्होंने जो भी देखा उसे जीवंत करते हैं। इस लिहाज से उनका काम काफी प्रशंसनीय है। साफ-सुथरी और पारिवारिक फिल्म का एसेंस देने में प्रणव सफल होते दिखाई दिए। फिल्म का बीजीएम बड़ा बाकमाल है। पर्दे पर इमोशन दिखता है जिसे बीजीएम ने दिल तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सिनेमेटोग्राफी की बात करें तो जिस तरह फिल्म की कहानी और लय सिंपल है, ठीक ऐसे ही डीओपी ने काम किया है।

स्क्रीनप्ले/गीत-संगीत/ एडिटिंग

फिल्म का स्क्रीन प्ले स्मूथ है। कसावट के साथ परोसा गया है। फिल्म के सभी गाने काफी खूबसूरत हैं। आठ गानों को बहुत ही अच्छी तरह से पिरोया गया है। पहला गाना लगभग आधे घंटे बाद आता है, जिससे यह साबित होता है कि मेकर्स ने सिर्फ इसलिए गाने नहीं डाले कि उसके पास कहानी नहीं है। वैसे तो सभी गीत दिलकश हैं लेकिन सुन ओ भौजी के सिस्टर, लाली लुगरा, तन-मन मोर झूमे जैसे गाने काफी कर्णप्रिय लगते हैं। श्रेष्ठ वर्मा की ने दूसरी फिल्म एडिट की है। उनका काम भी सराहनीय है।

कमियां

– फिल्म में कोई पंच नहीं है। फिल्म एक ही सुर में चलती जाती है। न कोई ब्रेकर न कोइे गड्ढा।
– मंडप में विलेन का तमाशा तो ठीक था लेकिन वहीं पेशाब कर देना सही नहीं लगा। इस सीन को टाला जा सकता था।
– अभिनेताओं द्वारा एक ही बात को कई बार बोलना जरूरी नहीं था। जैसे राज का यह कहना कि मुझे अरेंज मैरिज पसंद है और दीपक का यह कहना कि मुझे लव मैरिज।
– कोई भी व्यक्ति एन शादी के दिन या फेरे के समय कैसे शराब पी सकता है, ये बात भी थोड़ी हजम नहीं होती जबकि उस कैरेक्टर को अलग ही तरह से डेवलप किया गया था।
– कहीं न कहीं फाइट सीन की गुंजाइश भी निकालनी थी क्योंकि थाली में हर तरह के व्यंजन होने चाहिए।

संदेश

फिल्म संदेश देती है कि हम कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं घर के बड़े-बुजुर्गों की भावनाओं का आदर करना चाहिए। हर बड़े कामों से पहले उनकी भी रायशुमारी ली जानी चाहिए। दो भाइयों का एक-दूसरे के प्रति समर्पण भी ध्यान खींचता है।

Related Articles

Back to top button