शानदार मैसेज के साथ बंपर कॉमेडी पैकेज है टीना टप्पर

रेटिंग 4/5
सिनेमा 36. प्रणव झा निर्देशित और अमलेश-एल्सा स्टारर टीना टप्पर मनोरंजन की मेट्रो ट्रेन है। जो एक बार चल पड़ी तो रुकने का नाम ही नहीं लेती। वैसे तो फिल्म कॉमेडी जोनर की है जिसमेें रोमांस की परत चढ़ी हुई है। अमलेशन नागेश हो और फिल्म में कॉमेडी न हो, इसकी कल्पना दर्शक करेंगे भी नहीं। अमलेश के चाहने वाले कॉमेडी की मानसिकता बनाकर ही चलते हैं। फिल्म का दूसरा हिस्सा मजबूत है। एंडिंग के दौरान टीना टप्पर पार्ट 2 की घोषणा की गई है।
कहानी की बात की जाए तो सालिकराम उर्फ टप्पर (अमलेश नागेश) दसवीं में टॉपर है, इसलिए उसका नाम टप्पर पड़ गया। किसी वजह से वह आगे पढ़ नहीं पाता और आलुगुंडा बेचना शुरू कर देता है। उसका बनाया आलुगुंडा शहर में फेमस है। वह एक कॉलेज में भी आलुगुंडा सप्लाई करता है जहां उसकी आंखें टीना (एल्सा घोष) से चार हो जाती है और यहीं से टप्पर की रोमांस गाथा भी शुरू हो जाती है। हालांकि टीना उसे जरा भी भाव नहीं देती। टीना के पापा टीआई (उपेंद्र त्यागी)हैं और वे टीना के ही कॉलेज के एक प्रोफेसर से उसकी शादी करना चाहते हैं। एक हिसाब से देखा जाए तो टीना और टप्पर के बीच प्रोफेसर कबाब में हड्डी है।
डायरेक्शन/ स्क्रीनप्ले/ बीजीएम/ डायलॉग
प्रणव झा ने पूरी कोशिश की है कि निर्देशन सधा हुआ रहे, और वे इसमें कामयाब होते हुए भी दिखाई देते हैं। स्क्रीन प्ले बढिय़ा है, जो दर्शकों को बांधने में सफल होता दिखाई देता है। सीन के मुताबिक बीजीएम अच्छा है। फिल्म की सबसे अच्छी बात इसके संवाद हैं, जो कभी गुदगुदाते हैं तो कभी सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
गीत-संगीत/एडिटिंग/ सिनेमेटोग्राफी
विष्णु कोठारी ने बहुत ही खूबसूरत गीत लिखे हैं, वे होंगे 50 पार लेकिन उनके शब्दों में जवानी की रवानी है। श्याम हाजरा और तरुण गड़पायले का म्यूजिक काफी अच्छा है, इसमें प्रणव झा ने भी योगदान दिया है, जिसमें उनका रंग दिखाई देता है। दो गाने एवरेज हैं जबकि अन्य गीत बहुत कर्णप्रिय हैं। गौरांग त्रिवेदी ने एडिटिंग में कमाल दिखाया है लेकिन कुछ एक सीन में उनकी पकड़ में ढीलापन महसूस होता है। सिनेमेटोग्राफी में धु्रवन के काम की तारीफ करनी होगी। वे हर शॉट को नाप-नापकर लेते थे, अब समझ में आया कि उनका मापन इतना अच्छा क्यों रहा।
अभिनय
अमलेश की एक्टिंग नेचुरल है। उन्होंने अनगिनत हास्य पुट दिए हैं। एल्सा ने हर बार की तरह बेजोड़ अभिनय किया है। दर्शकों को उनकी सुंदरता भी खूब भाती है। पूनम-फेंकू की जोड़ी ने तो लोटपोट कर दिया। इतना ही नहीं पप्पू चंद्राकर, अंजली चौहान और नितेश कॉमेडियन ने खूब धमाल मचाया है। उपेंद्र त्यागी और राजेश बाघमारे की केमेस्ट्री भी अच्छी लगी है। बाल कलाकार देवांश विरवानी का छोटा लेकिन अच्छा रोल है। अनिता वर्मा, विकास साहू भी जमे हैं। नितेश कॉमेडियन की पत्नी का रोल करने वाली युवती ने तो कहर ही ढा दिया है। प्रोफेसर के तौर पर ताबीर हुसैन ने डेब्यू किया है, न तो वे टीजर में थे और न ट्रेलर में। इसलिए किसी ने उम्मीद नहीं की थी उनका रोल बड़ा होगा। कॉमेडी प्लस निगेटिव रोल में ताबीर के प्रयास को पब्लिक कितना पसंद करती है यह तो पब्लिक ही बता पाएगी।
क्यों देखें
ले शुरू होगे मया के कहानी के बाद अमलेश-एल्सा की जोड़ी कमाल-धमाल मचाने आई है। इनके फैंस के लिए तो यह अच्छा मौका है। फिल्म कहती है कि अगर हर कोई सरकारी नौकरी की चाहत रखे तो बाकी काम कौन करेगा। पढऩा-लिखना जरूरी है लेकिन मोटिव गवर्नमेंट जॉब न रहे।
कमियां
फाइट सीन को रोचक बनाने की गुंजाइश थी क्योंकि हीरो और विलन दोनों के किरदार सामान्य थे। प्रोफेसर का रोल कर रहे ताबीर हुसैन की एक्टिंग में सुधार की गुंजाइश थी। फिल्म की लंबाई 5 से 7 मिनट बढ़ाई जा सकती थी। मुख्य कलाकारों को शॉर्ट इंट्रोडक्शन भी दिया जा सकता था।