‘मया के पाती’ में प्यार का खुशनुमा अहसास
भूपेश के अभिनय को मिली सराहना, किशन का दिखा नया रूप

3/5
सिनेमा 36. जे. नूतन पंकज निर्देशित छत्तीसगढ़ी फिल्म “मया के पाती’ शुक्रवार को रिलीज हुई। यह फिल्म प्यार के खुशनुमा अहसास से सराबोर है। कहानी प्रेम ( भूपेश कुमार लिलहरे) और राधा (काजल सोनबेर) के इर्द गिर्द घूमती है जिसमें बिल्लू ( किशन सेन) और बरखा (श्रुति) की पैरलर लव स्टोरी चलती है। प्रेम की एंटीक पीस की शॉप है जिसमें मां ( संगीता निषाद) भी बैठती है। राधा के घर गिफ्ट आइटम छोड़ने गए प्रेम को पहली नजर में ही राधा से प्रेम हो जाता है। सब कुछ ठीक चल रहा होता है लेकिन अचानक से राधा को ब्लड कैंसर हो जाता है। वो प्रेम से दूर हो जाती है लेकिन एक गमले के नीचे उसके प्रेम की पाती मिलती रहती है। इधर प्रेम राधा के वियोग में शराबी हो जाता है। तभी उसकी जिंदगी में म्यूजिक कंपनी की मालिक राधिका ( काजल) की एंट्री होती है। राधिका प्रेम की सिंगर के तौर पर स्थापित कर देती है। क्या प्रेम की जिंदगी फिर से पटरी पर लौटती है? राधा का आखिर क्या हुआ? गमले के नीचे प्रेम की पाती कैसे आती रही? राधिका कौन? इनके जवाब आपको फिल्म में मिल जाएंगे।
निर्देशन/ स्क्रीनप्ले/ म्यूजिक
निर्देशन सामान्य से अच्छा है। कहानी को एग्जीक्यूट करने की पूरी कोशिश की गई है। स्क्रीनप्ले एवरेज है। म्यूजिक अच्छा है। गाने सुनने में अच्छे लगते हैं। अनुराग शर्मा और मोनिका वर्मा का युगल गीत सजाना हे काफी अच्छा है।
डायलॉग/ बीजीएम/ एडिटिंग/ लोकेशन
संवाद और उनकी अदायगी ठीक है। हालांकि डायलॉग में तालियों की कमी खलती है। बैंकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की गति को मेंटेन करता है। एडिटिंग में काफी गुंजाइश बन रही थी। लोकेशन काफी अच्छे बन पड़े हैं। ईंट की भट्टी का ड्रोन लुक तो कमाल का लगता है।
अभिनय
भूपेश ने अच्छे इमोशन और रिएक्शन दिए हैं। किशन की एक्टिंग कहीं कहीं ओवर लगी है। काजल सोनबेर का अभिनय एवरेज रहा। श्रुति भी एवरेज के आसपास रहीं। किशन के पिता का रोल कर रहे सरदार जी ओवर एक्टिंग के शिकार हुए। दिव्या नागदेव और संगीता निषाद ने मां की भूमिका के साथ न्याय किया है।
कमियां
फिल्म छत्तीसगढ़ी है लेकिन माटी की महक से दूर है। कहीं कहीं फिल्म की गति धीमी है।