साउथ इंडियन कैरेक्टर के बाद खूसट लवर बने सुनील
यादव जी के मधु जी के सेंट्रल कैरेक्टर सुनील चिपड़े से खास बातचीत

सिनेमा 36. इस महीने की 28 तारीख यानी 28 फरवरी को अपना सिनेमा की प्रस्तुति छत्तीसगढ़ी फिल्म यादव जी के मधु जी रिलीज होने जा रही है। इसमें यादव जी की भूमिका थिएटर कोच और फिल्म अभिनेता सुनील चिपड़े ने निभाई है। ये वही सुनील हैं जिन्होंने प्रणव झा निर्देशित बीए फाइनल ईयर में साउथ इंडियन पिता का रोल प्ले किया था। खास बातचीत में सुनील ने यादव जी.. और छत्तीसगढ़ी सिनेमा में अपनी मौजूदगी के बारे में बताया। सुनील कहते हैं, यह फिल्म छत्तीसगढ़ी भाषाई सिनेमा तो है ही पर दूसरे भाषाभाषी लोगों तक भी पहुंचेगी और उन्हें खूब हंसाएगी।
सीजी सिनेमा का अनुभव कैसा रहा?
सुनील ने बताया, कुछ साल पहले एक फिल्म बनी थी “भोला छत्तीसगढ़िया” उसमें निर्देशक ने सीजी फिल्म का पहला डबल रोल प्लान किया था। लेकिन फिल्म की लेंथ इतनी बड़ी हो गई थी कि उसे काटा गया तो डबल रोल का औचित्य ही समाप्त हो गया। लगभग 5 साल पहले बस्तर के बैकग्राउंड में बनी एक हिंदी फिल्म थी “कोसा” उसमें एक इंस्पेक्टर का प्रमुख नेगेटिव किरदार था। ये एक ऑफ बीट फिल्म थी जो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई थी । बीच में कुछ शॉर्ट फिल्म हुई। प्रणव झा जी की फिल्म “बी ए फाइनल ईयर” में मुझे एक साउथ इंडियन कैरेक्टर में लोगो ने देखा।
यादव जी.. मूवी कैसे मिली?
निर्देशक आदिलजी और निर्माता शिवालीजी मेरे थिएटर प्रोडक्शन देखते रहे थे। उन्होंने एक यू ट्यूब केलिए बनाई फिल्म में एक हिस्सा करवाया था । शायद उन्हें अच्छा लगा हो तो “यादव जी के मधु जी” में केंद्रीय चरित्र दिया। इसके पहले भी और फिल्म के प्रोजेक्ट में डिस्कस करते रहे हैं। एक पॉलिटिकल फिल्म इसके पहले लाइनअप ही थी जिसमें विलेन कास्ट किया था, पर निर्देशक और निर्माता को लगा कि ये फिल्म यादव जी के मधु जी के बाद बनाई जानी चाहिए तो पर्दे पर फिलहाल ये पहले है । दूसरी फिल्म अभी पाइपलाइन में है। बहरहाल, यादव जी.. में मेरा रोल बेशर्म किस्म का है लेकिन वह किरदार बड़ा भावुक है। एक समय ऐसा भी आता है जब उसे किसी से प्यार हो जाता है। उस प्यार को पाने के लिए वह जो भी करता है, दर्शक हंस हंसकर लोटपोट हो जाएंगे।
नए लोगों के साथ काम करने का कैसा अनुभव रहा?
बहुत सीखने वाला रहा। आज का यूथ टेक्निकली इंपावर्ड है। आज के सिनेमा की लैंग्वेज जानता है। प्रॉपर प्रोसेस में बनी फिल्म के यूथ के साथ अलग एक्सपीरियंस रहा। फिल्म, चरित्र, सिनेमेटिक प्रेजेंटेशन को लेकर लंबे डिस्कशन का रास्ता खुला था तो ये सफर कुल मिलकर मस्त रहा। कॉमिक और इंसिडेंटल एलिमेंट्स से फिल्म भरी है तो इंजॉय किया पूरी टीम के साथ। और ज्यादातर कलाकार थिएटर से है साथ काम कर चुके थे तो बॉन्डिंग पर्दे पर भी दिखेगी।
थिएटर का कितने साल का अनुभव रहा?
लगभग 35 से 40 सालों से थिएटर कर रहा हूं। हिंदी, छत्तीसगढ़ी, मराठी, बंगाली में नाटक निर्देशित किए हैं। अभिनय के साथ निर्देशन और बच्चों और युवाओं की ड्रामा वर्कशॉप करता रहा हूं। केंद्रीय जेल के बंदियों के साथ भी 5 साल तक ड्रामा की कार्यशाला लगातार करता रहा हूं।