
सिनेमा 36. छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री की अगर साफ सुथरी छवि बनेगी तो राज वर्मा टॉप 5 में शामिल होंगे। वैसे वे अपनी बिजनेस फील्ड में भी टॉप 5 में ही होंगे लेकिन फिल्म लाइन में उनका कहीं भी नंबर नहीं लग पा रहा है। वैसे इंडस्ट्री में उन्हें भी लगभग 20 साल तो हो ही गए लेकिन न तो एक्टर और न डायरेक्टर के तौर पर उन्हें पर्याप्त पहचान मिली और न ऊंचाई। हां प्रोड्यूसर के तौर पर उनका एक मुकाम इंडस्ट्री के बीच जरूर बन गया है क्योंकि हर आर्टिस्ट उनकी फिल्म में काम करने का इच्छुक रहता है।
अब बात करें कि उनके प्रोडक्शन हाउस का क्या होगा? लगातार फ्लॉप पर फ्लॉप के बाद उनके पास कोई उम्मीद की किरण है? जवाब है हां है। दरअसल प्रणव झा की कृपा से उन्हें धनेश जैसा मोती मिल गया जो कभी पिंटू मोबाइल के खाते में दर्ज था। पिंटू मोबाइल पता नहीं किस पेंच में फंसे की हाथ में हाथ धरे रह गए। पिंटू का दावा तो ये है कि धनेश को उन्होंने ही खोजा है।
खैर, इतना तो तय है कि राज वर्मा के पास आज की तारीख में कुछ है तो वो है धनेश का पिटारा। और इस पिटारे में कितना खजाना छिपा है ये तो 25 दिसंबर को ही पता चलना है।
सवाल यह भी है कि आखिर राज कब तक असफलता का बोझ उठाते रहेंगे और अपने मेहनत की गाढ़ी कमाई नाकाम फिल्मों में लुटाते रहेंगे। उन्हें उम्मीद है कि कभी तो वो दिन आएगा जब उन्हें न सिर्फ ट्रेड बल्कि आम जनता से भी वाजिब पहचान मिलेगी। कब वो दिन आएगा जब उन्हें किसी मॉल में लोग पहचानेंगे और सेल्फी लेंगे।
कहते हैं व्यक्ति की कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। राज भी उसी जीवट मिट्टी के बने हैं। उनकी जिद है कि मैं फिल्मों में दौलत न कमाऊं लेकिन शोहरत तो कमाकर ही दम लूंगा।




