‘माटी’: प्रेम कहानी के साथ बस्तर की हकीकत का असरदार चित्रण
रियल बस्तर को रील में उतारती ‘माटी’, रेटिंग 4.5/5

सिनेमा 36. वैसे तो बस्तर पर हिंदी और छत्तीसगढ़ी फिल्में पहले भी आ चुकी हैं लेकिन संपत झा लिखित और अविनाश प्रसाद निर्देशित छत्तीसगढ़ी फिल्म माटी कई मायनों में खास है। इतनी खास कि इसे शब्दों में पिरो पाना थोड़ा मुश्किल जान पड़ता है।
कहानी शुरू होती है बस्तर की नैसर्गिक खुबसूरती से। भीमा ( महेंद्र) के पिता की हत्या नक्सली कर देते हैं और फिर उसे अपनी गैंग में शामिल कर लेते हैं। उस वक्त भीमा की उम्र लगभग 15 साल थी लेकिन जैसे जैसे वो बड़ा होता है नक्सल संगठन भी उसकी पदवी बढ़ती जाती है।
उर्मिला (भूमिका साहा ) की मां कर्जे में रहती है और साहूकार उसे धमकी देता है कि अगर पैसे नहीं चुकाए तो वो उसकी बेटी को रखैल बनाकर रख लेगा। इस बीच नक्सल संगठन उर्मिला की मां से मिलता है और भूमिका को संगठन में सम्मिलित करने के लिए कहता है। मां न चाहते हुए भी बेटी को उनके हवाले इसलिए कर देती है कि उसे साहूकार की धमकी याद आ जाती है। इस तरह भीमा और उर्मिला दोनों एक ही संगठन में हैं और उनकी नजदीकी बढ़ती है। कहानी में मोड़ तब आता है जब दोनों नक्सल संगठन छोड़ मुख्य धारा में लौटना चाहते हैं। क्या वे मुख्य धारा में लौट पाएंगे? क्या उन्हें उनका प्यार मिल पाएगा और क्या नक्सली दोनों की लाशें बिछा देंगे? इनके जवाब आपको फिल्म में देखने को मिलेंगे।
निर्देशन/ स्क्रीन प्ले/ बीजीएम
अविनाश प्रसाद की पहली फूल लेंथ मूवी है। इससे पहले वे स्थानीय भाषा में फिल्म बना चुके हैं। पिछले अनुभवों का उन्हें अच्छा लाभ मिला है और उनका निर्देशन उभरकर सामने आया है। फिल्म का स्क्रीनप्ले आपको लास्ट तक इंगेज रखता है। और यही इंगेजमेंट बताती है कि स्क्रीन प्ले हो तो ऐसा। फिल्म का बैक ग्राउंड म्यूजिक भी सीन में फिट बैठता है, इस पर की गई मेहनत दिखती भी है।
गीत संगीत/ लोकेशन/ एक्टिंग
फिल्म का गीत संगीत काफी अच्छा बन पड़ा है जो फिल्म को गति देता है। लोकेशन नेचुरल हैं। बस्तर की सुंदरता का बखान करते हैं। अब बात आती है अभिनय की। किसी भी आर्टिस्ट ने ओवर एक्टिंग नहीं की है। बल्कि कास्टिंग की जितनी तारीफ की जाए कम है। महेंद्र और भूमिका ने अभिनय में मानो जान ही फूंक दी। हर किरदार चाहे वो धर्मा हो या नक्सल चीफ या फिर अन्य किरदार। हर किसी के किरदार को उतनी ही ऊंचाई दी गई है जिसका वे माद्दा रखते हैं।
क्यों देखें
डायरेक्टर अविनाश प्रसाद बस्तर में जन्मे और पले बढ़े हैं। उनकी कर्म भूमि भी बस्तर रही है। यही वजह है कि वे रील पर रियल बस्तर उतार पाए। अगर आपको बस्तर की पीड़ा, बस्तर का सच, बस्तर की खासियत, आदिवासियों और सरकार का द्वंद्व, पुलिस की ज्यादती, नक्सल और पुलिस प्रशासन के बीच फंसे निर्दोष ग्रामीण और एक खूबसूरत लव स्टोरी देखनी हो तो जरूर जाएं।
कमियां
पूरी फिल्म एक ही नेता धर्मा यानी महेंद्र कर्मा को ही हाइलाइट करती है। इसमें उच्च अधिकारियों से लेकर सरकार की भी मौजूदगी होनी थी। रियलिस्टिक सिनेमा में गानों की संख्या पर नियंत्रण जरूरी होता है लेकिन इसका ध्यान नहीं रखा गया। फिल्म पुलिस की मनमानी अपेक्षाकृत कम दिखाई गई है।




